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   विद्यस्थली का इतिहास

 

या कुंदनतुषारहार धवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणा वर दंड मंडीतइकरा या श्वेत पद्मासना
या ब्रह्मचयुत शंकर प्रभुतिभिदैवे सदा वंदिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निश्चय या पहा


भगवान शंकर से वरदान प्राप्त कर गुरु सांदीपनि व्यास जी ने चंदनवन में ही अपने आश्रम की स्थापना
की, यहां पर उस समय अनुमानित 5000 विद्यार्थी गुरु सांदीपनि से विद्या अर्जन करते थे! युगांधर के
मुताबिक आचार्य सांदीपनि की कुटिया में संपूर्ण भारत, कलिंग, अंग, भंग, मगध ,कामरूप ,आनत सौराष्ट्र
पंचनंद कश्मीर ,आदि देशों से पधारे आश्रम कुमार विद्यार्थी रहते थे!
द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण का कंस का वध करने के पश्चात मथुरा में यज्ञोपवीत संस्कार हुआ
यद्पि संस्कार का क्रम वार्षिक गंगाचार्य जी ने संपन्न कराया, यज्ञोपवीत संस्कार होने के बाद भगवान
श्री कृष्ण के पिता वासुदेव जी को उनके पठन-पाठन की चिंता सताने लगी, वासुदेव जी को महर्षि
सांदीपनि व्यास जी के बारे में ज्ञात हुआ कि एक प्रकांड विद्वान शिव उपासक ब्राह्मण देव हैं, यहां पर श्री कृष्ण बलराम को अध्ययन करने के लिए भेजना चाहिए! उस समय अवंतिका नगरी की राजमाता राजा जी देवीराजा जयसिंह की पत्नी हुआ करती थी, जो भगवान श्री कृष्ण के पिता वासुदेव की मुंह बोली बहन हुआ करती थी ,और भगवान श्री कृष्ण की बुआ हुआ करती थी! यद्पि संस्कार होने के बाद वासुदेव जी देवकी और रोहिणी के साथ समस्त मथुरा वासियों अश्रुपूर्ण आंखों से भगवान श्री कृष्ण और बलराम को विदाई दी, दोनों भाई रेशमी वस्त्र यज्ञोपवीत दुर्वा निर्मित मे कला श्रेणी धारण किए तथा कास्ट दंड लिए हुए अपने पराक्रम से पैदल ही अवंतिका नगरी पहुंचे थे

भगवान श्री कृष्ण ने थोड़े ही दिनों में अवंतिका पुरी में प्रवेश किया चंदनवन पहुंचे और उन्होंने गुरु सांदीपनि और गुरु माता सुश्रुषा को प्रणाम किया! और विद्या प्रदान करने के लिए गुरु जी से आग्रह किया ,भगवान श्री कृष्ण के मुखारविंद से अत्यंत तेज निकल रहा था यह देखकर मुनि सांदीपनि व्यास जी ने मन में सोचा कि यही दो तेजस्वी बालक है जिनका भगवान शंकर ने वरदान ने बताया था! यही जानकर गुरुवर ने उन्हें अध्यापन के लिए आज्ञा प्रदान की, तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण बलरामजी वहीं पर निवास करने लगे और गुरुजी से शिक्षा ग्रहण करने लगे, भगवान श्रीकृष्ण की आयु उस समय मात्र 11 वर्ष और 7 दिन की थी! भगवान ने मात्र 64 दिवस में 16 विद्याओं तथा 64 कलाओं का संपूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया श्री कृष्ण और सुदामा जी का मिलन भी इसी आश्रम में हुआ था सुदामा जी पोरबंदर के रहने वाले गरीब ब्राह्मण थे वह भी इस आश्रम अध्ययन के लिए वहां से पधारे थे!

शुक्लम ब्रह्म विचार सारपरमा माध्यम जगदव्यापिन ई
वीणापुस्तकधारिणी मयभदां जयंतयानधकारापहाम
हंसते स्फाटिकमालिकां च दद्दा दधतीपदमासने संसिथा
वंदे ता परमेश्वरी भगवती बुद्धि प्रदां शारदाम

 

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