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गोमती कुंड का इतिहास

 महर्षि सांदीपनि ऋषि के आश्रम में एक सुंदर सरोवर स्थित है , जो कि गुमती कुंड के नाम से प्रसिद्ध है !
इसकी स्थापना स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने की है, एक समय की बात है ,भगवान श्री कृष्ण ने देखा कि महर्षि नित्य सुबह सुबह योग विद्या से कहां जाते हैं, और क्या करते है, महार्षि अपनी योग विद्या के द्वारा गोमती नदी में स्नान आदि के लिए द्वारका नगरी जाया करते थे ,तो भगवान श्री कृष्ण की आत्मा को बड़ा कष्ट होता था, कि गुरुवर को नित्य प्रातः इतनी दूर स्नान करने के लिए जाना पड़ता है ! उन्होंने गुरुवर से प्रार्थना की कि है महाराज आप इतनी दूर स्नान करने क्यों जाते हो, तो गुरुवर ने उत्तर दिया कि में जब में बालक था तभी से गोमती नदी के तट पर बड़ा हुआ हूं ! और उन्हीं के आशीर्वाद से मुझे अभीष्ट सिद्धि प्राप्त हुई है, तभी से मेरा या नियम हैं की , प्रातः काल गोमती मैया के जल से ही स्नान करू , भगवान श्री कृष्ण ने कहा महात्मा आप इतनी दूर स्नान करने के लिए जाते 
है ,मैं आपकी कृपा और आशीर्वाद से गोमती मैया का जल यही प्रकट कर सकता हूं ! लेकिन गुरु सांदीपनि जी को यह विश्वास नहीं था कि यह एक 11 वर्षीय बालक गोमती मैया का जल कैसे प्रकट कर सकता है ! भगवान श्री कृष्ण गुरु सांदीपनि व्यास जी से आग्रह किया महाराज आप कल प्रात:काल गोमती में स्नान आदि कार्यों के लिए पधारे और वहां पर अपने कमडंल और खड़ाऊ पादुका वही घाट पर छोड़ कर आइएगा ,गुरु सांदीपनि व्यास जी ने ऐसा ही किया स्नान करने के बाद अपने कमंडल और खड़ाऊ को वहीं पर छोड़ कर वापस अपने गुरुकुल में पधार गए ! भगवान श्रीकृष्ण प्रतीक्षा ही कर रहे थे गुरुदेव को देखकर, उन्होंने प्रसन्नता पूर्वक गुरु जी को प्रणाम किया और आशीर्वाद पाकर उन्होंने अपना धनुष उठाया और मस्तक पर लगाकर गोमती मैया का आह्वान किया ! उन्होंने उस बाण को धरती पर इतनी तीव्र गति से मारा की बाण सीधे पाताल लोक तक चला गया और वहां पर जहां बाण मारा गया था ,वहां एक बहुत बड़ा गड्ढा बन गया , जिसने गाय के मुख का रूप ले लिया और उसके मुंह से जल की धारा प्रवाहित होने लगी ,देखते ही देखते वहां पर एक बहुत बड़ा जलाशय बन गया , जिसे गोमती कुंड नाम दिया गया ! महर्षि सांदीपनि ने जब नीचे की ओर जाकर देखा तो महर्षि जो अपने कमंडलु और खड़ाऊ गोमती तट पर छोड़कर आए थे उन्हें इस गोमती कुंड से प्राप्त हुए ! तभी से गुरु सांदीपनि को यह विश्वास हो गया की यह गोमती गंगा का ही पवित्र जल है , और मन ही मन उन्होंने भगवान भोलेनाथ भगवान को प्रणाम किया और भगवान श्री कृष्ण ने मन ही मन आशीर्वाद प्रदान किया! तभी से लेकर आज तक विद्यमान है इसके पश्चात उस गोमती कुंड में गुरु सांदीपनि व्यास जी और भगवान श्रीकृष्ण साथियो के साथ ध्यान करते थे। इसी कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण अपनी पट्टिका पर लिखे अंको को इस गोमती कुंड के जल से स्वच्छ करते थे। जिस स्थान पर खड़े होकर वह अपनी अंग पट्टी को धोया करते थे ,उसी स्थान पर भगवान श्री कृष्ण के चरणों के निशान शीला के ऊपर स्वता ही अंकित हो गए तभी से लेकर आज तक वह शीला आज भी उस गुमती कुंड में विद्यमान है

 

अध्य प्रवृत्ति लोकेश से वैसे मच्छरणांकिते
अवंती या कम पदाख़येअमृता नेक क्षयंति ते यमम!!

द्वापर काल से आज तक कलयुग में भी महर्षि सांदीपनि आश्रम परिसर में परम पवित्र गोमती कुंड विद्यमान है , इसकी गहराई 125 फुट है ! और इसमें से जो पानी निकलने का स्त्रोत है वह गोमुखी है नीचे गाय का मुख और उसके मुख से पानी आता है, भगवान श्री कृष्ण के आशीर्वाद से यह कुंड आज तक नहीं सुखा है इसमें पानी सर्वदा रहता है ! स्कंद पुराण के अनुसार इस क्षेत्र को भगवान श्री कृष्ण के चरण कमलो के निशान शीला पर अंकित होने के कारण अंक पाद क्षेत्र कहा जाता है ! यहां पर कुछ जन इस क्षेत्र को अंक पाचवी कहते हैं क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण अपनी प्लेट धोया करते थे तो यहां ऐसी मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण के जो अंक हैं इस पूरे क्षेत्र में फैले होने के कारण इस क्षेत्र को अनुपात की संज्ञा दी गई है

आज भी इस आश्रम पर गोमती कुंड में श्री कृष्ण जन्माष्टमी ऋषि पंचमी पर्व पर स्नान का महत्व श्रद्धालु यहां पर इन पर्व पर आते हैं धर्म का लाभ कमाते हैं एवं अपने जीवन को कृतार्थ करते हैं

 

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